Friday, August 28, 2015

* आरक्षण एक संवेदनशील तथा जटिल समस्या है ! *


             * आरक्षण एक संवेदनशील तथा जटिल समस्या है ! *
         पिछड़े जाती वर्ग समुदाय को राष्ट्र के मुख्य प्रवाह में लाने हेतु संविधान और कानून द्वारा “आरक्षण का मार्ग अपनाया गया ! लेकिन ५०-६० सालोंमे आरक्षण से सहूलियत और स्वार्थ की भावनाओमें आत्यंतिक वृधि हुई और उसी संविधान और कानून पर उंगली रखकर आरक्षण की व्याप्ति बढती गई,लेकिन दुःख की बात यह है की आज भी कई समाज घटक इस लाभ से वंचित है ! आश्चर्य यह है की हर एक जाती /धर्म अपने पिछड़े होने का दावा करने लगी !
          जहाँ आज भारत देश जाती धर्म से परे होने की बात कहता है वहाँ हम भारतीय अनुसूचित ,दलित तथा पिछड़े जाती /धर्म का होने का दावा करते है ,इस बात को सिद्ध करने हेतु कतार में खड़े दिखते है ! आज के भारत की यह कैसी विडंबना है ?
           सहूलियत और स्वार्थ बटोरने के लिए आज आरक्षण एक माध्यम दिखाई दे रहा है !यहाँ
बुद्धिमत्ता ,निपुणता की हार हो रही है और दुर्दैव इस बात का है की आज भारत का समाजपुरुष निस्तब्ध ,निर्बल दिख रहा है ! इससे देश का भला नहीं हो सकता !
           इस विषय पर आज किसी भी राजनितिक पक्ष से कोई उम्मीद नहीं नजर आती ! हर एक पक्ष एक दुसरे को अकार्यक्षम सिद्ध करने में जुटा है ! हर जाती के लोग एक दुसरेसे दूर जा रहे है ,टूट रहे है , मतभिन्नता चरम सीमा पार कर रही है ,लोग आपस में बंट रहे है ! आरक्षण का मुद्दा उछालकर लोगोंको आपस में उकसाने वाले हमारे नेतागण वास्तव में क्या चाहते है ? क्या सत्ता ,तिजोरी ,और शक्ति [लाठी] की लालच देशहित से बढ़कर है ?
            धर्म निरपेक्ष भारत में आरक्षण जाती धर्म पर आधारित न हो ,आरक्षण अगर देना ही है तो आर्थिक निकष पर हो , इस बात पर आज देश के नेतृत्व ने आपस में मिलकर निर्णय लेने का समय आया है ! इस सच को समज़िये ,यद् रहे –आरक्षण एक अति संवेदनशील तथा जटिल समस्या है !
                                                              
                                                सुहास सोहोनी
                                          सामाजिक विचार मंच ,अमरावती
                                               मोबा -९४५३४९३५४